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Thursday, April 30, 2009

ट्रेन ब्लॉग - मुंबई और महाराष्ट्र

मुंबई महाराष्ट्र का आईना न तो है और न कभी हो सकता है. एक शहर एक राज्य पर कितना हावी हो सकता है ये मुंबई में आकर पता चलता है.

कितने लोग यह जानते होंगे कि महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश के बाद लोकसभा की सबसे अधिक 48 सीटें हैं यानी दूसरा सबसे महत्वपूर्ण राज्य. लेकिन कोई ये नहीं कहता कि दिल्ली का रास्ता महाराष्ट्र से होकर भी गुज़रता है.

मुंबई से चुनाव लड़ रहे मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त,संजय निरुपम और किरीट सोमाया का नाम लोग जानते होंगे लेकिन कम लोग जानते होंगे कि शरद पवार के अलावा कौन सा बड़ा नेता महाराष्ट्र से चुनाव लड़ रहा है.
ऐसा क्यों है.
अगर लोकसत्ता के संपादक कुमार केतकर की मानें तो ये टेलीविज़न और अंग्रेज़ी अख़बारों की देन है. वो कहते हैं, ''जितने भी अंग्रेज़ीदां पत्रकार टेलीविज़न पर विश्लेषण करते हैं या अख़बारों में लिखते हैं उन्हें विदर्भ और मराठवाड़ा का अंतर भी नहीं पता है.वो बात रखते हैं सिर्फ़ और सिर्फ़ मुंबई शहर की. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उत्तर भारतीयों के बीच झगड़े को सबसे प्रमुखता दी जाती है लेकिन इसमें मरने वालों की संख्या एक होती है जबकि विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या सैकड़ों में होती है.''

मुझे केतकर की बातें कई स्तर पर सही लगीं. पिछले चुनावों में मैं मुंबई को छोड़कर महाराष्ट्र के कई ग्रामीण इलाक़ों में गया था और पूरे राज्य की तस्वीर पेश करने में सफल रहा था. इस बार मुंबई में हूं लेकिन यह बताने में सच में सक्षम नहीं हूँ कि महाराष्ट्र में कैसे परिणाम होंगे.

लेकिन ये बात यहीं ख़त्म नहीं होती. केतकर महाराष्ट्र की राजनीति के कई मिथकों पर से भी पर्दा उठाते हैं.

वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि आतंकवाद मुंबई में कोई मुद्दा नहीं है.मैंने जब आम लोगों से बातचीत की तो मैंने भी यही महसूस किया.

तो फिर 26/11 का क्या महत्व है मुंबई के जनमानस के लिए.

केतकर के अनुसार 26/11 ने मुंबई के मध्य वर्ग और ख़ास कर उच्च मध्य वर्ग को झिंझोड़ा है और हो सकता है कि ये मध्य वर्ग मतदान में ज़्यादा हिस्सा ले लेकिन किसी रिकार्ड मतदान की उम्मीद करना सही नहीं होगा.

यही हाल उत्तर भारतीयों के मुद्दे का भी है. केतकर कहते हैं कि राज ठाकरे के लिए वैसा माहौल नहीं है जैसा बाल ठाकरे के लिए था. बाल ठाकरे ने मराठियों में 'एक समुदाय' की भावना जगाई थी जबकि राज ठाकरे 'मराठी अस्मिता' पर ज़ोर देते हैं.

हां राज ठाकरे की पार्टी शिव सेना के वोट काट कर उनका खेल ख़राब कर सकती है.

पूरी बातचीत में मुझे यही लगा कि अब तक मैं महाराष्ट्र को मुंबई के आईने से ही देखता रहा था और अब मेरी आंखें खुली हैं. दिमाग पर ज़ोर दिया तो पाया कि कुछ ऐसा ही हाल कर्नाटक का है जिसे हम बंगलौर के आईने से देखते हैं.

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26 नवंबर के हमले झेलने वाला मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनल अब फिर से सामान्य दिखता है.
कमाल की बात ये है कि यह टर्मिनल चरमपंथी हमले झेलने के चार घंटे बाद भी सामान्य हो गया था. रात के करीब दस बजे स्टेशन पर गोलियां चली थीं लेकिन सुबह चार बजे पहली लोकल ट्रेन अपने नियत समय पर चली थी.

स्टेशन मैनेजर अशोक कुमार तिवारी उस रात को याद करते हुए संज़ीदा हो जाते हैं. वो कहते हैं, ''मैं डिनर करने बैठा ही था कि मुझे फ़ोन आया कि स्टेशन पर गोलाबारी हो रही है. मैं तुरंत चल दिया लेकिन सुरक्षा कारणों से मुझे स्टेशन पर आने में देरी हुई. पुलिसवाले मुझे भी स्टेशन पर आने नहीं दे रहे थे.''

जब वो स्टेशन पहुंचे तो क्या चल रहा था उनके दिमाग में, तिवारी कहते हैं, ''मेरे मन में बस एक ही बात थी कि जितनी जल्दी हो सके मुझे स्थिति सामान्य करनी है ताकि ट्रेनें ठीक समय पर चल सकें.''

तो किया क्या उन्होंने, तिवारी कहते हैं, ''मेरे स्टाफ कोई भी व्यक्ति स्टेशन छोड़कर नहीं गया था. हम काम कर रहे थे. घायलों को अस्पताल भेजना था और मृतकों को भी.''

क्या वो क्षण याद हैं उन्हें, तिवारी कहते हैं कि वो रात भूलती नहीं उनसे. वो कहते हैं, ''चारों तरफ खून ही खून फैला हुआ था. मानो खून का तालाब बन गया हो. मैं उसी के बीच खड़ा था और उसे साफ करवाने की कोशिश कर रहा था. घायल लोग फैले हुए थे. कई लोग मारे गए. मेरे ऑफिस में गोलियों के निशान आज भी हैं.''

तो क्या उन्हें इसके दुस्वप्न भी आते थे, तिवारी कहते हैं, ''बिल्कुल आते थे. मेरे सपनों में मुझे खून का तालाब दिखता था. मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ गया था. मैं दो तीन घंटे से अधिक सो नहीं पाता था. फिर मैं डाक्टर के पास गया. दवाइयां ली तब आराम हुआ. क़रीब दस पंद्रह दिन मैं बहुत परेशान रहा.''

तिवारी धार्मिक व्यक्ति हैं, कृष्ण के उपासक. वो कहते हैं, ''मैं इस्कॉन का सदस्य हूं. हमें मंत्रोच्चार करना होता है 16 बार लेकिन जब मैं परेशान हुआ तो मैं और अधिक मंत्रोच्चार करता था.''

तिवारी के लिए मुंबई के हमले बड़ी घटना थी लेकिन छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर उनके चार साल के कार्यकाल में कई बड़ी घटनाएं हुई हैं.

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