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Thursday, July 2, 2009

And She Came…

23rd June 2006, I was coming back from My College. I hope every Indian know the summer season in India, mainly in the month of June. Very hot outside, It looks like that we will burn if we stay more than 5 minutes in this hot. But I was thinking of some one.

“She did not come for last 3 days. I hope she will come today”

I was dreaming on the road, she may be come today, and then what will I do? I was dreaming and going to my home. Home is just 200 m away from there, so I was nearly reach to my Home. When I was at the door then hear some noises. Just looks like mental due to happiness. I thought she must in the house. Now I enter the home and asked to my mom if she came or not yet?

Mom: “No she did not come but don’t worry she will come”

I was just like “ ohh shitttttttttttt” and Put my books on bench.

“House is just like hell without her, right mom”

Mom; “Yea absolutely right”

I was hungry but when I hear that she already left then don’t want to eat anything. Just went to my room, everything was like shit without her. No any noise, no any work just like Hell on earth.

I was going to college for last 3 days without press my cloths. Every member of family was sad without her. No any one can do his / her work without her. She has very great importance in our life. We can say that we are dead without her. But what can we do? If she wishes then she will come, if not then she wont come.

Every family member was sad but can’t do anything. I was trying to don’t eat anything but I thought to eat something now because I was very hungry that time. Even I don’t like to eat without her. No any family members like to eat without her.

I just took a book in my hand and tried to read something. Suddenly I got a noise in my ear. That noise came from my room fan. When I saw on fan then I just throw the book on bed. There was a great noise outside the home. Children’s, ladies, peoples were crowded “Light Come…Light Come…..”


I was also happy to see that Light comes after 3 days in my village. Absolutely I was talking about Light. What you think??????

Friday, May 22, 2009

शाम तक क्या बेचें!

जो फटीचर लतीफ़ा मैं आपको सुना रहा हूँ. ये लतीफ़ा पाकिस्तान में पठानों पर और भारत में सरदारों पर रखकर सुनाया जाता है.



एक सरदार जी/ख़ान साहब, तेज़ गर्मी में ठेले पर फ़ालसे बेच रहे थे. एक ग्राहक आया, पूछा भाई साहब फ़ालसे क्या हिसाब बेच रहे हो. ठेले वाले ने कहा 70 रुपये किलो. ग्राहक ने कहा सब तौल दो. रेहड़ी वाले ने कहा कि सब फ़ालसे तुम ले गए तो शाम तक क्या बेचूंगा!!!



अब आप पूछेंगे यह वर्षों पुराना लतीफ़ा सुनाने का क्या मतलब है??? मतलब यह है कि मुझ जैसे सैंकड़ों पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों को सोलह मई के नतीजों की वजह से भारतीय जनता से मायूसी हुई है.



हम तो पिछले दो महीने से यह सोच कर अपने क़लम के भाले और ज़ुबानों की छुरियाँ तेज़ किए बैठे थे कि हिसाब-किताब, आँकड़े और सितारों की चाल बता रही है कि किसी भी पार्टी को चुनावों में बहुमत नहीं मिलेगा.



ऐसे में सरकार बनाने के लिए राजनेताओं में ख़ूब जूता चलेगा. धौंस और घूस से काम लिया जाएगा. तब कहीं जा कर 15-20 दिन बाद एक ऐसी सरकार की शकल उभरेगी जो शायद दो ढाई साल भी न निकाल पाए. फिर मध्यावधि चुनाव होंगे और फिर हम मीडिया वालों का धँधा चमकेगा.



मगर भोले वोटरों को शायद अंदाज़ा ही नहीं कि उसने हमारे अंदाज़ों पर बर्फ़ीला पानी उंडेल कर मीडिया को कितना नुक़सान पहुँचाया है.



वोटरों की इस हरकत से अगले 15-20 दिन तक की योजना बनाने वाले चैनलों, और समाचार पत्रों से जुड़े सैंकड़ो राजनीतिक टीकाकारों, विश्लेषकों, लेखकों, ग्राफ़िक डिज़ाइनरों, हाई प्रोफ़ाइल ऐंकरों, कैमरामैनों, कैमरे के आगे खड़े होकर नए राज़ खोलने की आदत में लगे रिपोर्टरों और एक्सक्लूसिव इंटरव्यू की दौड़ में हिस्सा लेने वाले संपादकों के करोड़ों रुपये डूब गए जो उन्हें फ़ीस और आने-जाने के ख़र्चे के रुप में मिल सकते थे.



हम सबके दिल में अरमान था कि आने वाले कई दिनों तक हाथी का चीटियों के साथ, शेर का बकरी के साथ और बिल्ली का चूहे के साथ राजनीतिक तोड़-जोड़ बैठाएं. रंगीन ग्राफ़िक्स और टिप्पणियों की मदद से अपनी-अपनी मनपसंद सरकार बनाएंगे, मिटाएंगे और फिर बनाएंगे. ख़ुद भी मज़े लेंगे और देखने, सुनने और पढ़ने वालों को भी मज़ा करवाएंगे.



लेकिन 15-20 दिन तक जो सर्कस लगना था वो 16 मई की शाम तक शामियाने के बाँस के साथ गढ़ने से पहले ही लद गया.



और अब हम सब मीडियाकर्मी विश्लेषक 46 डिग्री सेल्सियस में सच्चाई के तपते सूरज तले वोट के फ़ैसले की गर्म ज़मीन पर बैठे ये सोच रहे हैं कि सारे फ़ालसे वोटर ले गया, अब शाम तक क्या बेचें!



लेकिन मायूसी की कोई बात नहीं. गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में. 2004 में भी यही हुआ था. आने दें 2014 के चुनाव. हमने भी फ़ालसे की जगह तरबूज़ और कटहल का ठेला न लगाया तो नाम बदल देना. यह वोटर ख़ुद को आख़िर समझता क्या है!!!

Monday, May 11, 2009

लुंगी भी जाएगी!

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जैसे ही मैं हावड़ा जंक्शन की भीड़ चीरता हुआ बाहर निकला, एक सफ़ेद बालों वाला पीली टैक्सी समेत टकरा गया.

"हो आए साहब आप शांति निकेतन से?", मैं एकदम ख़ुद से एक अजनबी की इतनी बेतकल्लुफ़ी पर ठिठक गया.

लेकिन फिर उसी बेतकल्लुफ़ी पर रीझ गया. उसने मुझे सोचने का मौक़ा दिए बग़ैर कहा, वैसे तो आप किसी की भी टैक्सी में जा सकते हैं, पर यहाँ सारे खु्श्के हैं.

बात करते हैं तो मानो फावड़ा चला रहे हैं. आप हमारे साथ रहिए, आपको अच्छा लगेगा.

मैंने कहा, ठीक है, अगले आठ घंटों तक आप हमारे साथ रहेंगे. मगर लेंगे क्या, कहने लगा छह सौ नब्बे रुपए, क्योंकि सात सौ कहने से कस्टमर उछल जाता है.

मैंने पूछा, नाम क्या है, कहने लगा पवन कुमार यादव. बाइस साल पहले छपरा से आए थे, तबसे टैक्सी लाइन में हैं.

मैं अगला दरवाज़ा खोल कर पवन कुमार के बगल में बैठ गया. सफ़र के दौरान उससे पूछा, वोट किसे दिया?

कहने लगा पिछली बार डाकू को और अबकी बार चोर को...पिछले ने छह रुपए किलो चावल को 20 रुपए किलो तक पहुँचा दिया, इस बार लगता है, हमारी लुंगी भी जाएगी. कल किसी हराम... ने मोबाइल भी छीन लिया.

मैंने कहा, पवन कुमार पिछले एक महीने से मैं दिल्ली से बंगलौर और बंगलौर से कोलकाता तक सफ़र कर रहा हूँ. जनता तुम्हारी तरह नेताओं को सौ-सौ गालियाँ भी देती है पर वोट की लाइन में भी लगती है, यह क्या है.

"जनता को भी तो मज़ा लगा हुआ है. उसे अपने जैसा मूर्ख नहीं, डेढ़ अक्षर पढ़ा आदमी चाहिए जो एकदम मस्त भासन दे, भले रासन न दे. थके हारों को नौटंकी चाहिए, साहब, नौटंकी. जिसे आप जैसे विद्वान लोकतंत्र कहते हो."

मैंने कहा, पवन कुमार तुम्हें तो लोकसभा या विधान सभा में होना चाहिए. पवन कुमार यादव ज़ोर से हँसा, अगर हम विधायक बन गए तो टैक्सी कौन चलाएगा. नेता लोग तो टैक्सी तक नहीं चला सकते.

Thursday, May 7, 2009

ट्रेन ब्लॉग- गुजरात, गांधी और मोदी

ये आपकी ग़लती है कि आप गुजरात में गांधी को खोजते हैं.

साबरमती आश्रम के बाहर ऐसा सुनकर अचरज हुआ और वो भी तब जब ये बात बल्कि आश्रम के प्रमुख अमृत मोदी कह रहे हों.

वो कहते हैं, 'ये आपकी ग़लती है कि आप गुजरात में गांधी को खोजते हैं. बुद्ध जिस इलाक़े में पैदा हुए वहाँ कितने बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. जापान, चीन, श्रीलंका में आपको बौद्ध धर्म के लोग मिलेंगे लेकिन, नेपाल, बिहार और उसके आसपास कम ही मिलेंगे. गांधी को भी ऐसे ही समझिए. वो अर्जेंटीना और दक्षिण अफ्रीका में मिलेंगे जहां उनके मूल्यों की कद्र है.'

और नरेंद्र मोदी के बारे में क्या राय है अमृत जी की, 'कोई राय नहीं है नरेंद्र मोदी के बारे में. वो अपना काम करते हैं मैं अपना काम करता हूं.'

गुजरात का जवाब नहीं है. यह गांधी की भी भूमि है और नरेंद्र मोदी की भी. दोनों की नीतियां एक दूसरे के विपरीत लेकिन दोनों हीरो हैं जनमानस के.

जैसे अहमदाबाद साबरमती आश्रम के बिना पूरा नहीं होता वैसे ही यहां चुनाव से जुड़ी कोई भी बात मोदी के बिना पूरी नहीं होती है. मोदी के साथ ज़िक्र होता है हिंदू मुसलमानों के संबंधों का. हिंदू ये बात गर्व से करते हैं मुसलमान दबी ज़बान में.

हिंदू कहते हैं, 'गोधरा से पहले भी दंगे हुए थे लेकिन उसमें हिंदू मारे गए थे. गोधरा में दो दिन की छूट मिली. हिसाब बराबर हुआ. मोदी ने हमें आत्मसम्मान दिया है और अब विकास दे रहे हैं.हम बीजेपी को नहीं मोदी को वोट देते हैं.

मुसलमान कहते हैं, 'अब सबकुछ ठीक है. यहां दंगे नहीं होंगे. जब तक मोदी साहब हैं यहां शांति ही रहेगी.कुछ नहीं होगा.' ये कहते कहते वो तंज भरे लहज़े में मुस्कुराते हैं आपको बता जाते हैं कि वो असल में क्या कहना चाहते हैं.

लेकिन बच्चों को इतनी नफ़ासत कहां. जुम्मा मस्ज़िद में कुछ मुस्लिम बच्चे बीबीसी का माइक देखकर आ गए.

इन छोटे बच्चों को न तो गांधीजी से कोई लेना देना है और न ही मोदी से

वो कहते हैं, 'हम लोग जिस स्कूल में थे वहां हमें मारा जाता था क्योंकि हम मुसलमान हैं. टीचर धमकी देते थे फेल कर देंगे. पिटाई तो होती ही थी. हमारी क्लास में हिंदू बच्चे हमसे बात नहीं करते थे. हमें परेशान होकर स्कूल छोड़ना पड़ा. अब हम मोहम्मडन स्कूल में पढ़ते हैं और खुश हैं. कोई मारता पीटता नहीं है.'

नया शहर है नया ज़माना है और गुजरात में नया नेता है जिसकी पुराने से तुलना कहने पर अंग्रेज़ी की एक कहावत याद आती है each thesis has an antithesis and then synthesis...

ट्रेन ब्लॉग-गॉड और गॉडफॉदर

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लोग मंदिर, मस्जिद या दरगाह जाते हैं आध्यात्मिक शांति के लिए लेकिन अगर वहां आपसे जबरन पैसे की वसूली हो तो कैसा लगेगा.

दक्षिण भारत के मंदिरों में ऐसा कम ही होता है लेकिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर में मेरा अनुभव कुछ इससे हट कर ही रहा.

हुआ यूं कि जब ट्रेन पहुंची भुवनेश्वर तो मैंने सोचा कि क्यों न पुरी के जगन्नाथ मंदिर के दर्शन कर लिए जाएं.

दर्शन के लिए मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते समय कुछ पंडे आए लेकिन मैंने साफ मना कर दिया कि मुझे तो बस दर्शन करने हैं पूजा नहीं करनी.

समय था भगवान के मुफ्त दर्शन का यानी ग़रीबों के लिए जो कुछ घंटों बाद होने वाले दर्शन की फीस 25 रुपए नहीं दे सकते थे.

मैं भी हो लिया दर्शन के लिए. मंदिर के गर्भ गृह में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियों के पास अभी मैं पहुंचा ही था कि एक भारी भरकम पंडे ने मेरी गर्दन पर हाथ रखा और मेरा सर झुका दिया भगवान के चरणों में.

अगले कुछ मिनट मैं ज़बर्दस्ती भगवान के चरणों पर पड़ा रहने को मजबूर था. फिर उन्होंने झटपट कुछ मंत्र कहे. थोड़े चावल और प्रसाद दिया. फिर कड़कती आवाज़ में बोले दक्षिणा लाओ.

मैंने सौ का नोट निकाला तो बोले पांच सौ.. मैंने ना में सिर हिलाया तो बोले अच्छा तीन भगवान के लिए पचास पचास यानी डेढ़ सौ दे दो.

मैंने पैसे दिए और सोचा जान छूटी लेकिन तब तक बगल में खड़े एक और पंडे ने धर दबोचा और परिक्रमा के नाम पर एक गली में ले गए. मैं उनसे बार बार कहता रहा कि मैं परिक्रमा नहीं करना चाहता.

मात्र डेढ़ मीटर की उस अंधियारी गली में पांच से छह बार अलग अलग पंडों ने हाथ पकड़ कर धकिया कर पैसों की मांग की लेकिन अब मैं तय कर चुका था कि पैसे नहीं दूंगा.

हांफता हुआ गली से निकला और बाहर निकलने की कोशिश कर ही रहा था कि गली में ले जाने वाले पंडे ने हाथ में प्रसाद थमाया और पैसे मांगे. मैंने कहा प्रसाद नहीं चाहिए वापस लीजिए.

लेकिन वो अड़े रहे और कहने लगे भगवान नाराज़ होंगे. मजबूरन पचास रुपए देने पड़े.

किसी तरह पलटे तो गुस्से में भरी आवाज़ें सुनाई पड़ी...पता नहीं ये जोकाटा लोग कहां से आ जाते हैं जिनके पास पैसे भी नहीं होते हैं.

मैंने जैसे ही मुड़कर कुछ कहने की कोशिश की तो मुझे धकिया दिया गया यह कहते हुए... बाहर निकलो बाहर निकलो....

बाद में जोकाटा का मतलब पता चला कंजूस...

मंदिर से निकलने पर दुख हो रहा था कि भगवान तो दर्शन देना चाहते हैं लेकिन उनके ये गॉडफॉदर बने पंडे नहीं चाहते कि लोग दर्शन करें.

बाहर निकला तो मैंने मंदिर प्रशासन से बात की. प्रशासन के पीआरओ ने माना कि पंडे परेशान करते हैं और वो लोग लगातार कोशिश कर रहे हैं कि लोगों को परेशानी न हो.

मैं पहले भी पुरी के मंदिर में आ चुका हूं और कह सकता हूं कि पहले की तुलना में पंडो का प्रभाव कम हुआ है लेकिन गर्भगृह में अब भी उनकी तूती बोलती है.

मन की शांति के लिए मंदिर या दरगाह जाने वाले को अपनी जेब भी बचा कर रखनी पड़े तो बताइए इस भक्ति का क्या मतलब रह जाता है...

Wednesday, May 6, 2009

चिरंजीवी या आतंकवादी

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क्या मेरी शक्ल आतंकवादियों जैसी है या फिर मैं चिरंजीवी जैसा दिखता हूं.



हैदराबाद में आज कुछ ऐसा हुआ कि मुझे शीशे के सामने खड़े होकर ख़ुद को देखना पड़ा कि मैं आख़िर लगता कैसा हूं.



इससे पहले कि आप मेरी तस्वीर देख कर ख़ुद तय करें आपको बता दूं कि आख़िर हुआ क्या.



दिल्ली से लेकर अब तक हफ्ते से अधिक का सफ़र बीत चुका है और जहां कहीं भी हम ठहरे होटलों की सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद. बार-बार सुरक्षा जांच लेकिन किसी ने होटल के भीतर न तो कभी मुझे रोका और न ही पूछताछ की.



हैदराबाद इनसे अलग निकला. यहां पहला होटल था जिसमें सामान की तलाशी के बाद बीबीसी पत्रकारों की जामातलाशी भी ली गई.



होटल में ठहरने के दूसरे दिन मैं चारमीनार घूमने गया. कुछ तस्वीरें उतारनी थीं और लोगों से बात भी करनी थी.



चारमीनार के पास एक ईरानी होटल में बातचीत के दौरान एक व्यक्ति ने मुझसे कहा, ''आप चिरंजीवी जैसे लगते हैं. अगर आप थोड़े मोटे होते और थोड़ा सा कद होता तो बिल्कुल चिरंजीवी माफ़िक लगते हैं आप.''



मेरे 32 साल के जीवन की शायद यह सबसे अच्छी टिप्पणी थी मेरे लिए.चिरंजीवी तेलुगू सिनेमा के सुपर स्टार हैं और मैं एक दिन पहले ही उनका इंटरव्यू कर के आया था.



मुझे ख़ुशी तो हुई लेकिन ये ख़ुशी होटल पहुँचते ही काफूर हो गई.



होटल में मेरा दूसरा दिन था और रिपोर्टिंग करने के बाद मैं जब होटल में पहुंचा तो लिफ्ट के पास मुझे रोक दिया गया. गार्ड ने मुझसे सवाल करने शुरू किए.



कहां जाना है ? मैंने कहा अपने कमरे में...मैं यहीं रुका हूं. जवाब मिला...आप नहीं जा सकते..रिसेप्शन पर जाइए.

मैंने कहा, मैं बिल्कुल नहीं जाऊंगा रिसेप्शन पर. मैं यहीं रुका हूं. जवाब आया... तो फिर अपने रुम की चाबी दिखाइए.



मैंने चाबी दिखाई तो गार्ड झेंप गया और मुझे जाने दिया गया.



वैसे मुझे एक बार लंदन बम धमाकों के बाद भी रोका गया था जांच के लिए.जांच के बाद दी गई पुलिस की पर्ची आज भी मेरे पास है. तब मेरे बाल लंबे थे और दाढ़ी भी थी.



मैं अब कमरे में हूं और वाकई शीशे में देख कर सोच रहा हूं कि मैं कैसा दिखता हूं.



इस बार भी शायद मेरी दाढ़ी ने गड़बड़ कर दी. या फिर उस हरे-काले क़ाफिये ने जो मेरे गले में है.

राजनीतिक रूप से बालिग हुए राहुल

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जनवरी 2004 में जब प्रियंका गाँधी अपने भाई राहुल को पहली बार मीडिया और अमेठीवासियों से मिलवा रही थीं तो कई और पत्रकारों के साथ मैं भी वहाँ मौजूद था.



राहुल सबसे मिले. लेकिन उनमें काफ़ी हिचकिचाहट थी. कुछ शर्मीले और अंतरमुखी हैं भी वे. कुछ जगह वह लोगों से मुखातिब भी हुए. शायद एक-आध भाषण भी हुआ था. कुछ पक्का ध्यान नहीं पड़ता. लेकिन हम सभी पत्रकारों का निष्कर्ष लगभग एक ही था.



राहुल अपनी उम्र से भी ज्यादा छोटे और राजनीतिक पप्पू या कच्ची कौड़ी लगते थे.



इन पाँच वर्षों में कई बार राहुल को देखने-सुनने का मौक़ा मिला. सभी अनुभव से सीखते हैं. राहुल भी सीखें हैं, बदले हैं और बड़े हुए हैं.



और मंगलवार को जब राहुल दिल्ली में प्रेस कांफ़्रेस कर रहे थे तो उन्हें सुनते हुए मैं सोच रहा था कि 2009 की चुनावी मुहिम के दौरान कैसे देखते-देखते जैसे राहुल राजनीतिक रूप से बालिग हो गए हैं और मीडिया एवम् आम जनता कि नज़र में कैसे पार्टी महासचिव रहते हुए भी वह कांग्रेस के शीर्ष नेता बन गए हैं.



वर्ष 2004 का राजनीतिक पप्पू सयाना हो गया है. उसकी बातों में, पत्रकारों को उत्तर देने के तेवर और अंदाज़ में एक नया विश्वास और परिपक्वता है.



पिछले पाँच वर्षों के अपने सफ़र में राहुल ने हिचकिचाहट, अनिश्चय और राजनीतिक बातों के प्रति अपनी उदासीनता को पीछे छोड़ा है पर अपनी ताज़गी और ईमानदारी को बरक़रार रखा है.



बहुत लोगों का मानना है कि राहुल गाँधी मे एक 'सिनसेरिटी' या ईमानदारी तो है पर अपनी बहन प्रियंका जैसा करिश्माई जादुई व्यक्तित्व नहीं है.



100 लोगों के समूह के साथ बातचीत में तो राहुल का कोई सानी नहीं है पर जनसभा में एकत्रित भीड़ के साथ वह उस तरह का डायलॉग या संबंध नहीं स्थापित कर पाते जो एक 'नेचुरल' नेता या राजनीतिज्ञ कर सकता है.



अंतर शायद स्टाइल और सब्सटैंस का है. राहुल के पास सोच या सब्सटैंस तो है. उनके समर्थकों का कहना है स्टाइल भी जनसैलाब को लुभाने का और उससे सीधा रिश्ता बनाने का धीरे-धीरे आ जाएगा.

Thursday, April 30, 2009

ट्रेन ब्लॉग - मुंबई और महाराष्ट्र

मुंबई महाराष्ट्र का आईना न तो है और न कभी हो सकता है. एक शहर एक राज्य पर कितना हावी हो सकता है ये मुंबई में आकर पता चलता है.

कितने लोग यह जानते होंगे कि महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश के बाद लोकसभा की सबसे अधिक 48 सीटें हैं यानी दूसरा सबसे महत्वपूर्ण राज्य. लेकिन कोई ये नहीं कहता कि दिल्ली का रास्ता महाराष्ट्र से होकर भी गुज़रता है.

मुंबई से चुनाव लड़ रहे मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त,संजय निरुपम और किरीट सोमाया का नाम लोग जानते होंगे लेकिन कम लोग जानते होंगे कि शरद पवार के अलावा कौन सा बड़ा नेता महाराष्ट्र से चुनाव लड़ रहा है.
ऐसा क्यों है.
अगर लोकसत्ता के संपादक कुमार केतकर की मानें तो ये टेलीविज़न और अंग्रेज़ी अख़बारों की देन है. वो कहते हैं, ''जितने भी अंग्रेज़ीदां पत्रकार टेलीविज़न पर विश्लेषण करते हैं या अख़बारों में लिखते हैं उन्हें विदर्भ और मराठवाड़ा का अंतर भी नहीं पता है.वो बात रखते हैं सिर्फ़ और सिर्फ़ मुंबई शहर की. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उत्तर भारतीयों के बीच झगड़े को सबसे प्रमुखता दी जाती है लेकिन इसमें मरने वालों की संख्या एक होती है जबकि विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या सैकड़ों में होती है.''

मुझे केतकर की बातें कई स्तर पर सही लगीं. पिछले चुनावों में मैं मुंबई को छोड़कर महाराष्ट्र के कई ग्रामीण इलाक़ों में गया था और पूरे राज्य की तस्वीर पेश करने में सफल रहा था. इस बार मुंबई में हूं लेकिन यह बताने में सच में सक्षम नहीं हूँ कि महाराष्ट्र में कैसे परिणाम होंगे.

लेकिन ये बात यहीं ख़त्म नहीं होती. केतकर महाराष्ट्र की राजनीति के कई मिथकों पर से भी पर्दा उठाते हैं.

वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि आतंकवाद मुंबई में कोई मुद्दा नहीं है.मैंने जब आम लोगों से बातचीत की तो मैंने भी यही महसूस किया.

तो फिर 26/11 का क्या महत्व है मुंबई के जनमानस के लिए.

केतकर के अनुसार 26/11 ने मुंबई के मध्य वर्ग और ख़ास कर उच्च मध्य वर्ग को झिंझोड़ा है और हो सकता है कि ये मध्य वर्ग मतदान में ज़्यादा हिस्सा ले लेकिन किसी रिकार्ड मतदान की उम्मीद करना सही नहीं होगा.

यही हाल उत्तर भारतीयों के मुद्दे का भी है. केतकर कहते हैं कि राज ठाकरे के लिए वैसा माहौल नहीं है जैसा बाल ठाकरे के लिए था. बाल ठाकरे ने मराठियों में 'एक समुदाय' की भावना जगाई थी जबकि राज ठाकरे 'मराठी अस्मिता' पर ज़ोर देते हैं.

हां राज ठाकरे की पार्टी शिव सेना के वोट काट कर उनका खेल ख़राब कर सकती है.

पूरी बातचीत में मुझे यही लगा कि अब तक मैं महाराष्ट्र को मुंबई के आईने से ही देखता रहा था और अब मेरी आंखें खुली हैं. दिमाग पर ज़ोर दिया तो पाया कि कुछ ऐसा ही हाल कर्नाटक का है जिसे हम बंगलौर के आईने से देखते हैं.

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26 नवंबर के हमले झेलने वाला मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनल अब फिर से सामान्य दिखता है.
कमाल की बात ये है कि यह टर्मिनल चरमपंथी हमले झेलने के चार घंटे बाद भी सामान्य हो गया था. रात के करीब दस बजे स्टेशन पर गोलियां चली थीं लेकिन सुबह चार बजे पहली लोकल ट्रेन अपने नियत समय पर चली थी.

स्टेशन मैनेजर अशोक कुमार तिवारी उस रात को याद करते हुए संज़ीदा हो जाते हैं. वो कहते हैं, ''मैं डिनर करने बैठा ही था कि मुझे फ़ोन आया कि स्टेशन पर गोलाबारी हो रही है. मैं तुरंत चल दिया लेकिन सुरक्षा कारणों से मुझे स्टेशन पर आने में देरी हुई. पुलिसवाले मुझे भी स्टेशन पर आने नहीं दे रहे थे.''

जब वो स्टेशन पहुंचे तो क्या चल रहा था उनके दिमाग में, तिवारी कहते हैं, ''मेरे मन में बस एक ही बात थी कि जितनी जल्दी हो सके मुझे स्थिति सामान्य करनी है ताकि ट्रेनें ठीक समय पर चल सकें.''

तो किया क्या उन्होंने, तिवारी कहते हैं, ''मेरे स्टाफ कोई भी व्यक्ति स्टेशन छोड़कर नहीं गया था. हम काम कर रहे थे. घायलों को अस्पताल भेजना था और मृतकों को भी.''

क्या वो क्षण याद हैं उन्हें, तिवारी कहते हैं कि वो रात भूलती नहीं उनसे. वो कहते हैं, ''चारों तरफ खून ही खून फैला हुआ था. मानो खून का तालाब बन गया हो. मैं उसी के बीच खड़ा था और उसे साफ करवाने की कोशिश कर रहा था. घायल लोग फैले हुए थे. कई लोग मारे गए. मेरे ऑफिस में गोलियों के निशान आज भी हैं.''

तो क्या उन्हें इसके दुस्वप्न भी आते थे, तिवारी कहते हैं, ''बिल्कुल आते थे. मेरे सपनों में मुझे खून का तालाब दिखता था. मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ गया था. मैं दो तीन घंटे से अधिक सो नहीं पाता था. फिर मैं डाक्टर के पास गया. दवाइयां ली तब आराम हुआ. क़रीब दस पंद्रह दिन मैं बहुत परेशान रहा.''

तिवारी धार्मिक व्यक्ति हैं, कृष्ण के उपासक. वो कहते हैं, ''मैं इस्कॉन का सदस्य हूं. हमें मंत्रोच्चार करना होता है 16 बार लेकिन जब मैं परेशान हुआ तो मैं और अधिक मंत्रोच्चार करता था.''

तिवारी के लिए मुंबई के हमले बड़ी घटना थी लेकिन छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर उनके चार साल के कार्यकाल में कई बड़ी घटनाएं हुई हैं.